कर्मों की सार्थकता
इस संसार में हर किसी को, कोई न कोई कार्य करना ही पड़ता है| इसलिए आध्यात्म में कहा गया है कि यह संसार कर्मों की खेती है| और प्रत्येक मनुष्य इस खेती को करने के लिए बाध्य है| जिस प्रकार से एक किसान अपने खेतों में जैसा बीज बोता है, उसे वैसा ही फसल प्राप्त होता है| ठीक इसी प्रकार मनुष्य भी जैसा कर्म करता है, उसे वैसा ही फल भोगना पड़ता है| इसी कर्म रूपी खेती को काटने के लिए मनुष्य को बार-बार इस पृथ्वी पर जन्म लेना और मरना पड़ता है| यही बंधन है, जो मनुष्य को उसके लक्ष्य, उस परम धाम तक पहुंचने नहीं देता|
मनुष्य इन्हीं कर्मों के कारण ही भटकता रहता है|
अब यदि मनुष्य चाहे कि वह कोई कर्म ही न करें जिससे कर्म के बंधन उस पर न पड़े तो यह असंभव है| भगवान श्री कृष्ण गीता में कहते हैं कि क्षण भर के लिए कोई भी व्यक्ति कर्म किए बिना रह नहीं सकता| व्यक्ति को प्राकृतिक गुणों के बंधन में होने के कारण विवश होकर कर्म करने ही पड़ते हैं| परंतु मनुष्य को यह विचार करना है कि वह किस प्रकार कर्म के मार्ग पर चलता हुआ जीवन को सफल बनाएं| बहुत व्यक्तियों का कहना है कि अच्छे कर्म करो, किसी से झूठ मत बोलो, हेराफेरी ना करो| परंतु केवल अच्छे कर्मों के द्वारा ही जीवन का कल्याण संभव नहीं है| एक बार प्रभु श्री राम और लक्ष्मण बैठे थे| तभी अचानक प्रभु श्री राम हंस पड़े| लक्ष्मण आश्चर्यचकित होकर प्रभु श्री राम को देखने लगे| लक्ष्मण ने पूछा, भैया ऐसी हंसने वाली क्या बात हुई कि आप एकाएक हंस दिए| तब भगवान राम ने कहा कि सामने वह जो कीड़ा पेड़ पर चढ़ा रहा है उसे देखकर हंसी आ गई| लक्ष्मण ने देखा कि एक कीड़ा पेड़ पर चढ़ने का प्रयास कर रहा है| परंतु बार-बार नीचे गिर जाता है|
लक्ष्मण ने भगवान राम से पूछा कि इसमें हंसने वाली क्या बात हुई कृपया मुझे भी बताइए| तब भगवान राम ने कहा कि लक्ष्मण जिस कीड़े को तुम देख रहे हो इसमें जो चेतन शक्ति है अर्थात यह जीवात्मा 18 बार स्वर्ग के राजा इंद्र की गद्दी पर बैठ चुका है| परंतु इसके पश्चात भी यह 84 लाख योनियों में भटक रहा है अर्थात जब मानव रूप में जन्म मिला, अच्छे कर्म किए, अश्वमेध यज्ञ किए, स्वर्ग के राजा इंद्र की गद्दी मिल गई| सुख ऐश्वर्य भोगा, तत्पश्चात फिर 84 लाख योनियों में भटकने के बाद मानव तन, फिर इंद्र की गद्दी और इसके बाद अब पुनः 84 लाख योनियों में भटक रहा है| यहां पर हमें यह संकेत मिलता है कि केवल अच्छे कर्मों द्वारा ही कल्याण संभव नहीं है |

गुरुवाणी में श्री गुरु अर्जुन देव जी कहते हैं कि जीव जितने भी कर्म करता है वह कर्म करते करते थक जाता है परंतु बंधन से छुटकारा नहीं मिल पाता| परंतु ऐसा नहीं है कि अच्छे कर्मों का कोई लाभ नहीं| अच्छे कर्मों द्वारा ही कल्याण संभव है| परंतु कैसे? इसी को जानना है| एक राजा हुए हैं नहुष, जिन्होंने अपने मानवीय जीवन में एक सौ अश्वमेघ यज्ञ किए थे| वह मनुष्य शरीर के पश्चात स्वर्ग में देवता बनकर पहुंच गए| एक बार स्वर्ग के राजा इंद्र को ब्रह्महत्या के कारण छिपना पड़ा तो इंद्रासन खाली हो गया| सभी देवताओं ने यह विचार करने के लिए सभा बुलाई की राजा के बिना स्वर्ग का राज्य कैसे चलेगा| तब गुरु बृहस्पति ने कहा कि इस समय देवताओं के राजा नहुष ही ऐसे राजा है जो 100 अश्वमेघ कर चुके हैं| इसलिए उतने समय के लिए नहुष को ही इंद्रासन दे देना चाहिए| ऐसा विचार कर नहुष को इंद्रासन पर बैठाया गया| तब नहुष मनमाना आचरण करने लगा| एक दिन उसने इंद्राणी केेे पास भी संदेश भेजा कि जब तक मैं राजा हूं तब तक वह भी मुझे अपने पति के रूप में स्वीकार करें| ऐसा संदेश सुनकर इंद्राणी घबराई हुई देव गुरु बृहस्पति के पास पहुंची| सारी वार्ता गुरु बृहस्पति को कह सुनाइ| देव गुरु बृहस्पति ने इंद्राणी से कहा कि तुम नहुष के पास यह संदेश भेजो कि यदि वह सप्तऋषियों द्वारा अपनी पालकी उठवा कर तुम्हारे पास आए तभी तुम उसे आपने पति के रूप में वरण करोगी अन्यथा नहीं| जब नहुष के पास ऐसा संदेेश पहुंचा तो उसने बिना कुछ विचार किए सप्तर्षियों को आदेश दे दिया|
सप्त ऋषि निर्मल स्वभाव के कारण नहुष की पालकी उठाकर इंद्राणी की महल की तरफ चल दिए| परंतु नहुष कामवासना से पीड़ित था और सप्त ऋषि धीरे-धीरे चल रहे थे| नहुष ने पर भटकते हुए कहा कि सर्प-सर्प अर्थात जल्दी जल्दी चलो तब अगस्त ऋषि ने कहा कि मूर्ख कामवासना में अंधा होकर तू उचित और अनुचित भी भूल गया| अत: जा सर्प योनि में गिर, सर्प हो जा| और नहुष को स्वर्ग के राज्य से सर्प योनि में जाना जाना पड़ा| विचारणीय तथ्य है कि मनुष्य अच्छे कर्म तो करें, परंतु यह सार्थक कैसे हो, यह जानना है| कहते हैं-
देवता मनुष्य में किसी का जीवन स्थिर नहीं है इसलिए जीवन के लक्ष्य को संवारने के लिए संतों की चरण धूलि कल्याणकारी हो सकती है| कर्म भी तभी सार्थक होते हैं जब वह परमात्मा के चरणों में समर्पित हो जाए| एक बार जब राजा बलि 100 वा अश्वमेघ यज्ञ करने जा रहे थे तब बली के पास संदेश आया कि उसके द्वार पर एक ब्राह्मण भिक्षा लेने आया है| बलि ने कहा कि उन्हें मुंह मांगा दान दे दिया जाए| तब कर्मचारियों ने कहा कि राजन वह ब्राह्मण बालक आपसे ही दान लेना चाहता है| तब बलि ने कहा कि यदि वह बालक है तो उसका ज़िद करना भी स्वभाविक है|
अत: राजा बलि बटुकुमार के पास पहुंचे| उन्हें प्रणाम किया और विनती की कि है ब्राह्मण कुमार! आपको जो चाहिए वह मांग लो| उस बटु कुमार ने कहा कि राजन मुझे केवल ढाई पग भूमि चाहिए तब बली बहुत हैरान हुए की केवल ढाई पग भूमि| राजा बलि ने संकल्प देने के लिए जल मांगा| शुक्राचार्य पहचान गए क्या यह बटुकुमार नहीं वरन ब्राह्मण कुमार के रूप में स्वयं भगवान विष्णु है| तब उन्होंने बलि को कहा कि "बली इस ब्राहमण कुमार को वचन देने से इंकार कर दो क्योंकि यह ब्राह्मण कुमार नहीं वरन बटुक कुमार के रूप में विष्णु है|" राजा बलि ने कहा कि क्या यह वही विष्णु है जिनके दर्शनों के लिए योगी, ऋषि, मुनि, तपस्वी अनेक वर्षों तक तपस्या करते हैं और जिनके दर्शन वर्षों की तपस्या के पश्चात भी सुलभ नहीं है| शुक्राचार्य ने उत्तर दिया "हां यह वही विष्णु है|" तब बली ने कहा कि यदि यह बटु कुमार नहीं अपितु विष्णु हैं जिनका ध्यान योगी ऋषि एवं तपस्वी करते हैं तब मैं इन्हें भिक्षा देने से कैसे इंकार कर सकता हूं| शुक्राचार्य ने कहा कि यदि इंकार नहीं करेगा तो पाप का ही भागी बनेगा, क्योंकि तेरे वचन देने के पश्चात ही अपने शरीर को बढ़ाकर एक ही पग से सारी पृथ्वी को, तथा दूसरे पग से सारा ब्रह्मांड नाप लेंगे| तब तीसरे पग के लिए तेरे पास कोई संस्थान ही नहीं रहेगा| आता है इस कारण पाप का भागी बनेगा|
परंतु राजा बलि ने कहा कि यदि बटु कुमार वास्तव में विष्णु है तब मैं इनकार नहीं कर सकता| शुक्राचार्य ने क्रोध सहित श्राप दिया कि जिस संपत्ति का तुझे अभिमान है, जिसके कारण तू मेरी बात मानने से इंकार कर रहा है, कुछ ही समय पश्चात उस संपत्ति से वंचित हो जाएगा| परंतु बली टस से मस नहीं हुए|
उन्होंने बटु कुमार को वचन देते हुए कहा कि आपको जहां ढाई पग भूमि चाहिए आप माप लीजिए| मैं आपके द्वारा नापी हुई ढाई पग भूमि आपको देने का वचन देता हूं| तब बटु कुमार अपना शरीर बढ़ाना शुरू किए और पहले ही पग में सारे पृथ्वी को नाप लिया और दूसरे पग से ब्रह्मांड को नाप दिया|
तत्पश्चात बटु कुमार ने बलि से कहा, राजन, तुम्हारी संपत्ति को तो मैंने दो पग में ही नाप लिया है| अब तीसरा पर कहां रखूं? तब बली ने कहा कि भगवान तीसरा पर आप मेरी नाक पर रखिए| नाक अहंकार का प्रतीक है| मैं स्वयं को आपके चरणों में समर्पित करता हूं| इस प्रकार बली का प्रण पूर्ण हुआ| तब प्रभु ने बली को विष्णु रूप में दर्शन दिए और बाली से कहा कि तुम राज्य पाने की इच्छा से एक कर रहे थे| इसलिए मैं तुम्हें पाताल का राज्य देता हूं| मैं तुम्हारे भक्ति भाव से बहुत प्रसन्न हूं| तुम सब कुछ जानने के पश्चात भी अपने प्राण पर अडिग रहें| अतः मांगो तुम्हें क्या चाहिए| जो मांगोगे मैं तुम्हें वही दूंगा| बली ने कहा कि प्रभु पाताल में राज्य भोगते मेरी केवल यही प्रार्थना है कि मुझे प्रत्येक द्वार पर आपके ही दर्शन हो| इससे प्रभु को वचनबद्ध होकर राजा बलि के लिए प्रत्येक द्वार पर पहरेदार की तरह खड़ा होकर दर्शन देने पड़े| बलि ने अपने प्रेम के द्वारा प्रभु को बांध लिया| इस प्रकार यह स्पष्ट हो जाता है कि कर्मों की सार्थकता तभी है, जब वह प्रभु को समर्पित कर दिए जाए|

केवल मात्र शिक्षाओं के आधार पर परिवर्तन असंभव है| जिस प्रकार बीमार व्यक्ति को यदि हम कहे कि वह बीमारी को छोड़ दे
रोग का त्याग कर दे एवं रोग का त्याग ही मनुष्य को स्वस्थ कर सकता है| परंतु केवल मात्र शिक्षा ही बीमारी का उपचार नहीं है| किसी व्यक्ति के पेट में दर्द हो रहा है, अब डॉक्टर उसे कहे कि पेट के दर्द को छोड़ दो यह दर्द ठीक नहीं तुम्हें परेशान करेगा तो डॉक्टर का कहना उचित है परंतु केवल कहने से रोग ठीक नहीं हो सकता उसके लिए शिक्षा की नहीं चिकित्सा की आवश्यकता है|
कहने का भाव यह है कि जिस प्रकार रोग से छुटकारा पाने के लिए शिक्षा की नहीं चिकित्सा की जरूरत है| ठीक इसी प्रकार बुरे विचारों से छुटकारा पाने के लिए जरूरत है सत्य को जानने की| सदाचार अर्थात सत्+ आचार | सत्य को जाने बिना हम सत्य के प्रति व्यवहार किस प्रकार कर सकते हैं| रोगी को शिक्षा की नहीं चिकित्सा की जरूरत है| शिक्षा तो केवल बता सकती है क्या उचित है क्या अनुचित है| इसी प्रकार मानव के कल्याण के लिए जरूरत शिक्षा की नहीं अपितु दीक्षा की है| अतः हमें जरूरत है ऐसे संत सतगुरु की जो हमें सत्य का बोध करा दे|
Great thoughts
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